सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: नागरिकता अधिनियम की धारा 6A की संवैधानिक वैधता बरकरार
भारत के सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में नागरिकता अधिनियम की धारा 6A की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा है। यह धारा उन व्यक्तियों के लिए नागरिकता की प्रक्रिया को निर्धारित करती है, जो 1971 में बांग्लादेश के साथ युद्ध के बाद भारत में शरणार्थी के रूप में आए थे।
फैसले की पृष्ठभूमि
- नागरिकता अधिनियम, 1955: यह अधिनियम भारत में नागरिकता प्राप्त करने के नियमों को निर्धारित करता है। धारा 6A विशेष रूप से उन व्यक्तियों के लिए बनाई गई थी, जो पूर्वी पाकिस्तान (वर्तमान बांग्लादेश) से भारत में आए थे और 24 मार्च 1971 से पहले भारत में प्रवेश किया था।
- संविधानिक चुनौती: इस धारा के खिलाफ विभिन्न याचिकाएँ दायर की गई थीं, जिसमें इसे असंवैधानिक बताया गया था। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि यह धारा भारतीय संविधान के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करती है और यह भेदभावपूर्ण है।
सुप्रीम कोर्ट का फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने इस धारा को संवैधानिक मानते हुए कहा कि:
- सुरक्षा और स्थिरता: सरकार ने यह धारा सुरक्षा और स्थिरता के संदर्भ में बनाई थी, ताकि भारत में आए शरणार्थियों को स्थायी नागरिकता प्रदान की जा सके।
- इतिहासिक संदर्भ: न्यायालय ने यह भी कहा कि इस धारा का निर्माण उस समय की परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए किया गया था, जब बांग्लादेश के साथ युद्ध के बाद लाखों लोग भारत में शरण लेने आए थे।
- संविधान का पालन: कोर्ट ने कहा कि धारा 6A का प्रावधान संविधान के मूल अधिकारों के खिलाफ नहीं है और यह उचित है।
प्रतिक्रिया
इस फैसले के बाद, नागरिक अधिकारों के संगठनों ने मिश्रित प्रतिक्रियाएँ दी हैं। कुछ ने इसे एक महत्वपूर्ण कदम माना है, जबकि अन्य ने चिंता व्यक्त की है कि यह शरणार्थियों के अधिकारों को सीमित कर सकता है।
