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क्या ब्रिक्स के लिए छटपटा रहे तुर्की की राह चीन ने मुस्लिमों की वजह से रोकी, भारत ने पाकिस्तान के चलते दिया साथ?

ब्रिक्स (ब्राजील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका) में तुर्की की संभावित सदस्यता को लेकर हाल ही में कई चर्चाएं हुई हैं। तुर्की, जो खुद को एक महत्वपूर्ण क्षेत्रीय शक्ति मानता है, ने इस समूह में शामिल होने की इच्छा जताई है। हालांकि, तुर्की की राह में कई रुकावटें आ रही हैं, जिनमें से एक प्रमुख कारण चीन का स्टांस है, विशेष रूप से मुस्लिम समुदाय को लेकर।

तुर्की की सदस्यता की कोशिशें

तुर्की ने ब्रिक्स समूह में शामिल होने की इच्छाशक्ति दिखाई है, यह कहते हुए कि इस संगठन के जरिए वह वैश्विक स्तर पर अपनी राजनीतिक और आर्थिक स्थिति को मजबूत करना चाहता है। राष्ट्रपति रेसेप तईप एर्दोगन ने इसे अपनी विदेश नीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बताया है। तुर्की का मानना है कि ब्रिक्स जैसे बहुपरकारी समूह में शामिल होने से उसे अधिक शक्ति और समर्थन मिलेगा।

चीन का रुख

हालांकि, चीन ने तुर्की की ब्रिक्स में सदस्यता को लेकर अपनी चिंताओं को स्पष्ट किया है। चीन की इस प्रतिक्रिया का मुख्य कारण तुर्की की मुस्लिम नीतियां और इसकी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस्लामिक मुद्दों के प्रति संवेदनशीलता हैं। चीन, जो उइगर मुस्लिमों के मामले में अंतरराष्ट्रीय आलोचना का सामना कर रहा है, तुर्की को इस समूह में शामिल करने से बचने के लिए सतर्क हो गया है।

भारत का समर्थन

भारत, जो खुद पाकिस्तान के साथ कई मुद्दों में उलझा हुआ है, ने तुर्की के प्रति सहानुभूति दिखाई है। भारत का मानना है कि ब्रिक्स में तुर्की की सदस्यता से क्षेत्रीय संतुलन में मदद मिल सकती है। साथ ही, भारत के लिए यह एक रणनीतिक कदम हो सकता है, जिससे वह पाकिस्तान के प्रभाव को कम करने में सहायता पा सकता है।

क्षेत्रीय प्रभाव

तुर्की की संभावित सदस्यता और इसके चारों ओर हो रही राजनीति ब्रिक्स के लिए एक महत्वपूर्ण विकास है। यह सवाल उठता है कि क्या तुर्की अपनी मुस्लिम पहचान के कारण चीन की आपत्ति को पार कर सकेगा और भारत के समर्थन का लाभ उठा पाएगा।

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