समुद्र में समाई द्वारका नगरी की खोज: एएसआई ने शुरू किया नया अन्वेषण अभियान
“भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) ने भगवान कृष्ण की प्राचीन नगरी द्वारका को समुद्र की गहराइयों से खोज निकालने के लिए एक नई खोज शुरू की है। यह अन्वेषण अभियान एएसआई के अतिरिक्त महानिदेशक (पुरातत्व) प्रो. आलोक त्रिपाठी के नेतृत्व में पांच पुरातत्वविदों की एक विशेष टीम द्वारा किया जा रहा है।“
द्वारका नगरी की खोज का उद्देश्य
इस अभियान का मुख्य उद्देश्य द्वारका नगरी के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक साक्ष्य जुटाना है।
समुद्र में डूबी इस प्राचीन नगरी के सभी पहलुओं का अध्ययन कर इसकी ऐतिहासिक प्रामाणिकता को प्रमाणित करना।
भारत की समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर को संरक्षित करने और दुनिया को भगवान कृष्ण की नगरी की प्रामाणिकता दिखाने के लिए यह खोज महत्वपूर्ण है।
किन इलाकों में की जा रही है खोज?
टीम ने गोमती क्रीक के पास एक क्षेत्र का चयन किया है, जहां पहले भी प्राचीन अवशेष मिले थे।
एएसआई का अंडरवाटर पुरातत्व विंग (यूएडब्ल्यू) पहले भी द्वारका, बंगाराम द्वीप (लक्षद्वीप), महाबलीपुरम (तमिलनाडु) और एलीफेंटा द्वीप (महाराष्ट्र) में खोज कर चुका है।
2005 और 2007 में भी द्वारका में भारतीय नौसेना के सहयोग से खोज अभियान चलाया गया था, जिसमें समुद्र की गहराई से कटे-छंटे पत्थर और चूना पत्थर के अवशेष मिले थे।
नौसेना और पुरातत्व विभाग का संयुक्त प्रयास
भारतीय नौसेना और एएसआई पहले भी 2005 और 2007 में समुद्री तलहटी में मौजूद द्वारका के अवशेषों की जांच कर चुके हैं।
तब समुद्र के भीतर से 200 से अधिक नमूने निकाले गए थे, जिनमें प्राचीन इमारतों के अवशेष और चूना पत्थर के खंड शामिल थे।
इस बार की खोज पहले की तुलना में ज्यादा विस्तृत और आधुनिक तकनीक से लैस होगी।
द्वारका नगरी की ऐतिहासिकता और महत्व
द्वारका को भगवान श्रीकृष्ण की नगरी माना जाता है, जो महाभारत काल में समुद्र में समा गई थी।
पुराणों और महाभारत में इसका उल्लेख मिलता है कि श्रीकृष्ण ने द्वारका को बसाया था।
पिछले शोधों से यह साबित हुआ है कि द्वारका में प्राचीन नगर के अवशेष समुद्र के नीचे दबे हुए हैं।
इस नए अभियान से यह प्रमाणित करने की कोशिश की जाएगी कि यह वही द्वारका नगरी है, जिसका वर्णन महाभारत और पुराणों में किया गया है।
द्वारका नगरी की यह खोज भारतीय इतिहास और पुरातत्व के लिए एक ऐतिहासिक पहल साबित हो सकती है।
यह अभियान भारतीय संस्कृति और भगवान श्रीकृष्ण के अस्तित्व से जुड़े ऐतिहासिक प्रमाणों को उजागर कर सकता है।
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) और नौसेना का यह संयुक्त प्रयास भारतीय धरोहर को विश्व स्तर पर पहचान दिलाने में मदद करेगा।
