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भारत की सांस्कृतिक धरोहरों से मेरा जुड़ाव और भुवनेश्वर की ऐतिहासिक विरासत

मेरा अपने देश की सांस्कृतिक धरोहरों के प्रति जुड़ाव स्वाभाविक रूप से हुआ है, जोकि मेरी निरंतर यात्राओं से विकसित हुआ। यह सफर भारत के विभिन्न हिस्सों को देखने से शुरू हुआ और धीरे-धीरे मुझे अपने देश की विविध संस्कृति के प्रति सम्मान और प्रेम का अहसास होने लगा।

विद्यालय में बचपन से ही हम “सारे जहां से अच्छा हिंदुस्तान हमारा” गाते आए थे, लेकिन यह क्यों सबसे अच्छा है, इसका उत्तर मुझे खुद भारत भ्रमण के दौरान मिला। अपने अनुभवों से मैंने इसे देखकर, छूकर और महसूस करके जाना

भारत की धरोहरों को विश्व मान्यता

पिछले दस वर्षों में भारत की कई सांस्कृतिक धरोहरों को यूनेस्को विश्व धरोहर सूची में शामिल किया गया है। यह प्रक्रिया आसान नहीं होती क्योंकि इसके लिए धरोहर का अद्वितीय होना आवश्यक होता है। साथ ही, यह भी देखा जाता है कि उस धरोहर को कितना संरक्षित रखा गया है

अपने बीस वर्षों के यात्रा अनुभव में मैंने देश के कोने-कोने में कई धरोहरों को देखा है, लेकिन अभी भी बहुत कुछ देखने को बचा हुआ है। जब भी मौका मिलता है, मैं नई सांस्कृतिक धरोहरों को देखने और समझने निकल पड़ती हूं।

भुवनेश्वर: मंदिरों का शहर और एकाम्र क्षेत्र की पौराणिकता

इस बार मेरी यात्रा मुझे ओडिशा की राजधानी भुवनेश्वर लेकर गई, जिसे मंदिरों का शहर कहा जाता है। भुवनेश्वर ने हाल ही में यूनेस्को विश्व धरोहर की संबंधित सूची में स्थान बनाया है।

भुवनेश्वर एक ऐसी जगह है जो आधुनिकता और संस्कृति का सुंदर संगम प्रस्तुत करती है। यहाँ तेज भागती दुनिया से अलग एक अलग ही शांति देखने को मिलती है। लोग आराम से टहलते हैं, खुली हवा में सांस लेते हैं और जीवन का आनंद लेते हैं। यही बात इस जगह की सांस्कृतिक धरोहरों को भी खास बनाती है।

जब मैं एकाम्र क्षेत्र की ओर बढ़ी, तो मेरे मन में यह सवाल उठा कि इस जगह का नाम एकाम्र क्षेत्र क्यों पड़ा?

एकाम्र क्षेत्र की पौराणिक कथा

इस सवाल के जवाब में स्थानीय लोगों ने बताया कि अतीत में यहां आम के बहुत सारे पेड़ हुआ करते थे, इसलिए इसे एकाम्र क्षेत्र कहा गया।

हालांकि, जब मैंने लिंगराज मंदिर के पुरोहित से इसका कारण पूछा, तो उन्होंने मुझे एक रोचक पौराणिक कथा सुनाई।

कहते हैं कि भगवान शिव और माता पार्वती ने विवाह के बाद सबसे पहले काशी में रहने का निर्णय लिया। लेकिन जैसे-जैसे वहां की जनसंख्या बढ़ी, शांति घटने लगी। इस कारण वे शांति की तलाश में पूर्व की ओर बढ़े और ओडिशा पहुंचे

उस समय यहां घना जंगल हुआ करता था। भगवान शिव ने एक आम के पेड़ के नीचे ध्यान लगाया और ध्यान में इतने तल्लीन हो गए कि माता पार्वती को पीछे छोड़ आए। जब मां पार्वती उन्हें खोजते हुए यहां आईं, तो उन्होंने देखा कि गायें उस आम के पेड़ के नीचे खुद-ब-खुद दूध दे रही थीं। यह देखकर माता को एहसास हुआ कि भगवान शिव इसी स्थान पर ध्यान में लीन हैं। तब से इस क्षेत्र को “एकाम्र क्षेत्र” कहा जाने लगा। इसे “गुप्तकाशी” भी कहा जाता है।

भारत की सांस्कृतिक धरोहरें सिर्फ ऐतिहासिक स्मारक नहीं हैं, बल्कि ये हमारी परंपराओं, मान्यताओं और संस्कृति का प्रतीक भी हैं।

भुवनेश्वर का एकाम्र क्षेत्र, अपनी पौराणिक कथाओं और सांस्कृतिक महत्व के कारण, विश्व धरोहर सूची में स्थान बनाने की दिशा में बढ़ रहा है। यह यात्रियों और इतिहास प्रेमियों के लिए एक अद्भुत स्थल है, जहाँ हर कोना अपनी अनूठी कहानी कहता है।

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