पाकिस्तान में बलूच प्रदर्शनकारियों पर फायरिंग: महिलाओं-बच्चों को भी नहीं बख्शा
इस्लामाबाद, मार्च 2025 — पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में एक बार फिर खून बहा है, और इस बार भी निशाना बने हैं बलूच समुदाय के आम नागरिक, जो वर्षों से गुमशुदगी, सैन्य दमन और अधिकारों की मांग को लेकर प्रदर्शन कर रहे हैं। रिपोर्टों के अनुसार, हाल ही में बलूचिस्तान की राजधानी क्वेटा और अन्य शहरों में शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे बलूच नागरिकों पर पाकिस्तानी सुरक्षाबलों द्वारा फायरिंग की गई, जिसमें कई लोग घायल हुए और कुछ की जान भी चली गई।
सबसे दुखद बात यह रही कि इस हिंसा में महिलाएं और बच्चे भी नहीं बचे। सुरक्षाबलों की क्रूर कार्रवाई ने पूरे इलाके में दहशत का माहौल पैदा कर दिया है। यह घटना न केवल पाकिस्तान की आंतरिक नीतियों पर सवाल उठाती है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों को भी सोचने पर मजबूर कर रही है।
इस लेख में हम जानेंगे कि बलूच प्रदर्शन क्यों कर रहे थे, फायरिंग कब और कैसे हुई, कितने लोग प्रभावित हुए, और इस पूरी घटना के सामाजिक, राजनीतिक और अंतरराष्ट्रीय प्रभाव क्या हो सकते हैं।
बलूचिस्तान: एक इतिहास जो संघर्ष में लिखा गया
बलूचिस्तान पाकिस्तान का सबसे बड़ा और सबसे संसाधन-समृद्ध प्रांत है, लेकिन यह सबसे उपेक्षित और असंतुष्ट इलाकों में भी गिना जाता है। बलूच राष्ट्रवादी लंबे समय से यह आरोप लगाते रहे हैं कि इस्लामाबाद की सरकार और पाकिस्तानी सेना उनके संसाधनों का शोषण कर रही है और बलूचों को शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, और राजनीतिक भागीदारी से वंचित रखा गया है।
बलूचिस्तान में दशकों से स्वतंत्रता की मांग, गुमशुदा व्यक्तियों की वापसी, और मानवाधिकारों की बहाली को लेकर आंदोलन चलते रहे हैं। पाकिस्तानी सरकार इन आंदोलनों को “राष्ट्र-विरोधी” करार देती है और अक्सर बलपूर्वक कुचलने की रणनीति अपनाती है।
प्रदर्शन का कारण: गुमशुदा युवकों की वापसी की मांग
इस बार बलूच समुदाय का गुस्सा कुछ युवकों के अपहरण और गुमशुदगी को लेकर भड़का। स्थानीय संगठनों का दावा है कि पाकिस्तानी खुफिया एजेंसियों ने इन युवकों को घर से उठाया और अब उनका कोई पता नहीं है। इन घटनाओं के खिलाफ स्थानीय निवासियों ने क्वेटा, तुरबत, ग्वादर, और पंजगुर जैसे इलाकों में धरने और रैलियों का आयोजन किया।
इन प्रदर्शनों की खास बात यह थी कि इसमें बड़ी संख्या में महिलाएं और बच्चे भी शामिल हुए। उन्होंने हाथों में गुमशुदा परिजनों की तस्वीरें लेकर शांतिपूर्ण ढंग से अपनी माँग रखी कि उनके बच्चों, पतियों और भाइयों को वापस लाया जाए।
फायरिंग की घटना: कब और कैसे हुआ हमला?
14 मार्च 2025 को, क्वेटा शहर में हजारों की संख्या में बलूच नागरिकों ने “बलूच मिसिंग पर्सन्स” अभियान के तहत मार्च निकाला। प्रदर्शन पूरी तरह शांतिपूर्ण था। जैसे ही यह रैली क्वेटा प्रेस क्लब के पास पहुँची, तभी वहां भारी संख्या में पुलिस और अर्धसैनिक बल तैनात किए गए।
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, भीड़ ने नारेबाज़ी शुरू की — “ग़ायब बेटों को वापस करो”, “बलूचिस्तान हमारा है”, “हमें ज़िंदा रहने दो” — तभी अचानक पुलिस ने आँसू गैस के गोले, लाठीचार्ज और फिर फायरिंग शुरू कर दी।
कुछ चश्मदीदों का कहना है कि पुलिस और सेना ने बिना किसी चेतावनी के गोलियाँ चलाईं। भीड़ में भगदड़ मच गई। महिलाएं अपने बच्चों को लेकर भागने लगीं। लेकिन गोलियों की बौछार से कई लोग ज़मीन पर गिर पड़े।
कितने लोग घायल और मृत हुए?
बलूच कार्यकर्ताओं और मानवाधिकार संगठनों के अनुसार:
- कम से कम 11 प्रदर्शनकारी मारे गए, जिनमें 2 महिलाएं और एक बच्चा शामिल हैं।
- 50 से अधिक लोग घायल हुए हैं, जिनमें से कुछ की हालत गंभीर है।
- दर्जनों लोगों को गिरफ्तार किया गया है, जिनमें महिलाएं भी शामिल हैं।
- कई घायल प्रदर्शनकारियों को इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती करने से भी रोका गया, ऐसी रिपोर्टें सामने आई हैं।
हालांकि पाकिस्तानी प्रशासन ने मृतकों की संख्या को ‘बढ़ा–चढ़ाकर बताया गया’ कहकर खारिज किया है, लेकिन वीडियो और फोटो सबूत कुछ और ही कहानी बयान कर रहे हैं।
मानवाधिकार संगठनों की प्रतिक्रिया
इस घटना ने अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों को सकते में डाल दिया है। एमनेस्टी इंटरनेशनल, ह्यूमन राइट्स वॉच और यूएनएचआरसी (संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद) ने पाकिस्तान से जवाब माँगा है।
एमनेस्टी की साउथ एशिया प्रमुख ने कहा:
“बलूच नागरिकों पर इस तरह की बर्बर कार्रवाई निंदनीय है। महिलाओं और बच्चों पर गोली चलाना किसी भी सभ्य राष्ट्र के लिए शर्म की बात है।”
संयुक्त राष्ट्र के प्रवक्ता ने भी कहा है कि वे पाकिस्तान सरकार से स्पष्टीकरण माँगेंगे और जरूरत पड़ी तो जांच दल भेजेंगे।
पाकिस्तानी सरकार का बचाव
पाकिस्तान के गृह मंत्रालय ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस कर कहा कि:
“बलूच प्रदर्शनकारियों में कुछ तत्व हिंसक हो गए थे और उन्होंने सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने की कोशिश की। फोर्स ने संयमित बल का प्रयोग किया।”
सरकार ने मारे गए लोगों की संख्या को ‘3’ बताया और कहा कि मामले की जांच के आदेश दिए गए हैं।
हालांकि यह बयान बलूच संगठनों और मीडिया फुटेज से मेल नहीं खाता, जिससे पाकिस्तान सरकार की नीयत पर सवाल उठ रहे हैं।
बलूच नेताओं का गुस्सा
बलूच राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों ने इस फायरिंग को ‘राज्य प्रायोजित नरसंहार’ करार दिया है। बलूच नेशनल मूवमेंट (BNM) और बलूच रिपब्लिकन पार्टी (BRP) जैसे संगठनों ने पूरे प्रांत में हड़ताल और विरोध दिवस की घोषणा की है।
बलूच नेता डॉ. नासिर बलोच ने कहा:
“यह सिर्फ गोली नहीं थी, यह हमारे आत्मसम्मान और अस्तित्व पर हमला था। लेकिन हम डरने वाले नहीं हैं। अब हम अंतरराष्ट्रीय अदालत का दरवाज़ा खटखटाएँगे।”
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिक्रिया और चुप्पी
भारत सहित कुछ देशों ने इस घटना पर चिंता जताई है, लेकिन अब तक अमेरिका, चीन या अन्य शक्तिशाली देशों की ओर से कोई स्पष्ट बयान नहीं आया है। विश्लेषक मानते हैं कि भू–राजनीतिक समीकरण अक्सर मानवाधिकार से ज्यादा अहम हो जाते हैं, और यही कारण है कि बलूच मुद्दा वैश्विक मंच पर अनसुना रह जाता है।
हालांकि सोशल मीडिया पर बलूच डॉयस्पोरा सक्रिय हो चुका है। दुनिया के कई शहरों में पाकिस्तानी दूतावासों के बाहर विरोध प्रदर्शन की योजना बनाई जा रही है।
बलूच महिलाओं की भूमिका: दर्द और साहस
इस पूरे आंदोलन में बलूच महिलाएं सबसे आगे रही हैं। अपने लापता बेटों, पतियों, भाइयों की तस्वीरें लेकर वे सड़कों पर उतरीं। क्वेटा की इस घटना में घायल होने वाली एक महिला शहीदा बलोच की तस्वीर सोशल मीडिया पर वायरल हो चुकी है, जिसमें वह खून से लथपथ एक बच्चे को गोद में लिए बैठी है।
बलूच महिला संगठन की सदस्य शबनम बलोच ने कहा:
“हम माँ हैं, बहनें हैं, लेकिन सबसे पहले इंसान हैं। हम अपने परिवार को इंसाफ दिलाए बिना चुप नहीं बैठेंगी।”
क्या यह जनांदोलन का रूप ले सकता है?
बलूच आंदोलन अब एक जनांदोलन का रूप लेता जा रहा है। पहले यह सीमित समूहों का मुद्दा था, लेकिन अब आम लोग खुलकर सरकार के खिलाफ बोलने लगे हैं। शिक्षाविद, छात्र, लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता भी इस आंदोलन का हिस्सा बनते जा रहे हैं।
विश्लेषकों का मानना है कि अगर पाकिस्तान ने समय रहते गंभीर संवाद और समाधान की पहल नहीं की, तो यह असंतोष और उग्र रूप ले सकता है — जो पाकिस्तान की आंतरिक स्थिरता के लिए खतरनाक होगा।
निष्कर्ष: कब तक खामोश रहेगा विश्व?
पाकिस्तान के बलूचिस्तान में जो हुआ, वह सिर्फ एक कानून व्यवस्था की घटना नहीं, बल्कि वर्षों की पीड़ा, अपमान और दमन का विस्फोट है। बलूचों की आवाज़ को कुचलने के लिए अब गोलियों का सहारा लिया जा रहा है, और सबसे चिंताजनक बात यह है कि महिलाएं और मासूम बच्चे भी इस बर्बरता से नहीं बचे।
अब सवाल यह है कि क्या दुनिया सिर्फ निंदा कर के चुप बैठ जाएगी? क्या मानवाधिकार संगठनों की रिपोर्टों का कोई असर होगा? और सबसे बड़ा सवाल — क्या पाकिस्तान अपने ही नागरिकों को इस तरह मारकर एकता कायम रख सकता है?
बलूचिस्तान की धरती पर गूंज रहे नारे अब सिर्फ एक प्रांत की पुकार नहीं, बल्कि इंसाफ और मानवता के लिए एक वैश्विक चुनौती बन चुके हैं।
