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मध्य प्रदेश की ऐतिहासिक धरोहरें यूनेस्को की अस्थायी सूची में शामिल

मध्य प्रदेश की समृद्ध ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहरों को वैश्विक पहचान दिलाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल हुई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में, प्रदेश की चार ऐतिहासिक धरोहरों को यूनेस्को (UNESCO) की अस्थायी सूची में शामिल किया गया है।

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने इस उपलब्धि पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा,

“मध्य प्रदेश के लिए यह गर्व का क्षण है कि हमारी ऐतिहासिक विरासत को वैश्विक स्तर पर पहचान मिल रही है। यह प्रदेश की समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर और ऐतिहासिक महत्व को प्रमाणित करता है।”

कौन-कौन सी धरोहरें यूनेस्को की अस्थायी सूची में शामिल हुईं?

  1. सम्राट अशोक के शिलालेख
  2. चौसठ योगिनी मंदिर
  3. गुप्तकालीन मंदिर
  4. बुंदेला शासकों के महल और किले

इन ऐतिहासिक स्थलों को शामिल किया जाना यह दर्शाता है कि मध्य प्रदेश अपनी समृद्ध विरासत के कारण भारत में एक विशेष स्थान रखता है।

यूनेस्को की अस्थायी सूची का महत्व

यूनेस्को की अस्थायी सूची में शामिल होने से इन स्थलों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिलती है। इसका प्रमुख लाभ यह है:

  • संरक्षण और संवर्धन: इन धरोहरों को संरक्षित करने के लिए नए संसाधन और तकनीकी सहयोग मिल सकता है।
  • पर्यटन को बढ़ावा: विश्व धरोहर का दर्जा मिलने से इन स्थलों पर घरेलू और विदेशी पर्यटकों की संख्या बढ़ेगी।
  • स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूती: पर्यटन में वृद्धि से स्थानीय व्यापार, रोजगार और सांस्कृतिक गतिविधियों को बढ़ावा मिलेगा।

मध्य प्रदेश में अन्य यूनेस्को धरोहर स्थल

मध्य प्रदेश में अब तक यूनेस्को द्वारा घोषित 18 धरोहर स्थल हैं। इनमें से तीन स्थायी सूची में शामिल हैं, जबकि 15 अस्थायी सूची में दर्ज हैं।

स्थायी यूनेस्को धरोहर स्थल:

  1. खजुराहो के मंदिर समूह
  2. भीमबेटका की गुफाएं
  3. सांची स्तूप

यूनेस्को की अस्थायी सूची में अन्य धरोहर स्थल:

  • ग्वालियर किला
  • बुरहानपुर का खुनी भंडारा
  • चंबल घाटी के शैल कला स्थल
  • भोजपुर का भोजेश्वर महादेव मंदिर
  • मांडू के स्मारक
  • ओरछा का ऐतिहासिक समूह
  • सतपुड़ा टाइगर रिजर्व
  • चंदेरी का ऐतिहासिक स्थल

इन चार धरोहरों का ऐतिहासिक महत्व

1. मौर्यकालीन अशोक के शिलालेख

मौर्य सम्राट अशोक द्वारा स्थापित शिलालेख भारत के सबसे प्राचीन लिखित अभिलेखों में से हैं। इनमें बौद्ध धर्म, शासन और नैतिकता से संबंधित संदेश अंकित हैं। मध्य प्रदेश में साँची स्तंभ अभिलेख, जबलपुर के रूपनाथ, दतिया के गुज्जरा और सीहोर के पानगुरारिया शिलालेख महत्वपूर्ण हैं।

2. चौसठ योगिनी मंदिर

9वीं से 12वीं शताब्दी के बीच निर्मित चौसठ योगिनी मंदिर भारत की तांत्रिक परंपराओं का प्रतीक हैं। इनकी गोलाकार संरचनाएं, अद्वितीय शिल्पकला और आध्यात्मिक महत्व इन्हें विशेष बनाते हैं। मध्य प्रदेश में मितावली (मुरैना), जबलपुर, बदोह, हिंगलाजगढ़ (मंदसौर), शहडोल और नरेसर (मुरैना) में स्थित योगिनी मंदिर यूनेस्को की सूची में शामिल किए गए हैं।

3. गुप्तकालीन मंदिर

गुप्तकाल (4वीं-6वीं शताब्दी ईस्वी) को भारतीय कला और संस्कृति का स्वर्ण युग माना जाता है। इस अवधि में निर्मित मंदिरों की आर्किटेक्चर और नक्काशी अद्वितीय है। इन मंदिरों में विदिशा, ग्यारसपुर, उज्जैन और सांची के गुप्तकालीन मंदिर शामिल हैं।

4. बुंदेला शासकों के महल और किले

16वीं और 17वीं शताब्दी में बुंदेला शासकों द्वारा निर्मित महल और किले अपनी भव्यता और वास्तुकला के लिए प्रसिद्ध हैं। इनमें ओरछा, दतिया, टीकमगढ़ और निवाड़ी के ऐतिहासिक स्थल शामिल हैं।

भविष्य की संभावनाएं और संरक्षण के प्रयास

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने एमपी टूरिज्म बोर्ड, संस्कृति विभाग और पुरातत्वविदों को बधाई देते हुए कहा कि यह उपलब्धि प्रदेश को विश्व पर्यटन मानचित्र पर नई ऊंचाइयों तक पहुंचाएगी। उन्होंने जनता से आह्वान किया कि हम सभी को अपनी ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण में योगदान देना चाहिए।

सरकार द्वारा किए जा रहे प्रयास:

  • संरक्षण एवं पुनरुद्धार योजनाएं लागू की जा रही हैं।
  • पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए नई योजनाएं बनाई जा रही हैं।
  • स्थानीय लोगों को जागरूक करने के लिए सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जा रहा है।

मध्य प्रदेश की चार महत्वपूर्ण धरोहरों का यूनेस्को की अस्थायी सूची में शामिल होना एक ऐतिहासिक उपलब्धि है। इससे प्रदेश की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और वास्तुकला धरोहरों को वैश्विक पहचान मिलेगी।

यह उपलब्धि न केवल राज्य की सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने में मदद करेगी, बल्कि पर्यटन और आर्थिक विकास में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।

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